अब वो बात कहाँ

अब वो बात कहाँ ...

अपने भावों और विचारों को दूसरों तक पहुँचाने का सबसे बेहतरीन जरिया है ‘बात करना’ । वैसे बातों की भी अनेक किस्में की होतीं हैं, जैसे- ऐसी-वैसी बातें, मज़ेदार बातें, नमकीन बातें, मीठी बातें, मिश्री घुली बातें, आँखों आँखों में बातें, सोची-समझी बातें, कानों सुनी बातें, सुनी-सुनाई बातें, विष घुली कडवी बातें, रस भरी बातें, चाशनी-सी बातें, जलेबी-सी बातें, लच्छेदार बातें, अपने आप से बातें, दीवारों से बातें और भी न जाने क्या-क्या ...जितने लोग उतनी बातें...अब इन बातों में रखा क्या है आखिर !! ये तो बातें हैं बातों का क्या !!
देखा जाए तो ‘बात’ शब्द केवल बात करने तक ही सीमित नहीं है... ‘बात’ शब्द अपने आप में बहुत गहराई को समेटे हुए है...इसमें विस्तार है...अनेक आयाम है...अनेक अर्थ समाये हुए हैं ...और हों भी क्यों न...न जाने कितने मुहावरे तो  सिर्फ ‘बात’ शब्द पर ही केन्द्रित है...आप भी देखिए न...देखने में क्या जाता है...हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या...
आखिर, बात से ही तो बात निकलती है मानों बातों की झड़ी-सी लगी हो ...और तो और  हर बात पर नई बात निकलती है और जब निकलती है तो खूब निकलती है... इतनी कि  दूर तलक निकल जाती है, कुछ तो बात है तभी तो बातों में दम है, बातों को तौल कर बोलिए तो  बात जम जाती है और यदि बिना बात गुस्सा किया जाए तो बात बदल भी जाती है, बात बात पर आग बबूला होना जनाब अच्छी बात नहीं...मन की बात कीजिए तो अच्छी बात है वरना बात मनवाना तो हमें भी आता है...अब इन बातों को बातों में न उड़ा दीजिएगा वरना बात फैल जाएगी और यदि ऐसा हुआ तो बात बिगड़ने में देर न लगेगी, देखिए, बात को दबाईएगा मत ...कोई बात नहीं, खुलकर बात करेंगे तभी तो बात बनेगी...मज़ेदार बात तो यह है कि बातों की महिमा ही अपरम्पार है...
 असल बात यह है कि ‘बात’- एक सार्थक कथन, वस्तु, महत्त्व, चर्चा, वास्तविकता, प्रसंग, विषय - इतने सारे अर्थों के लिए केवल एक शब्द – वाह क्या ‘बात’ है!! ... हिंदी भाषा में  शायद ही किसी और शब्द को इतना महत्त्व दिया गया है जितना कि ‘बात’ को...यह बहुत बड़ी बात है !! राजा है यह शब्द लेकिन आखिर क्यों? यह भी सोचने वाली बात है... यूँ तो
बातें तो हम लोग बहुत करते हैं... पर क्या बात करते है; ये भी सोचने की बात है ...
नदी की बातें, पंछियों की बाते, पेड़ों फूलों पत्तियों की बातें, धरती आकाश की बातें, चंद सूरज तारों की बातें, नदी झरने के बहते कल कल की बातें, वर्षा की टप-ताप झरती बूंदों, हवाओं में तैरते संगीत के अनेक सुरों की बातें ...आप कहेंगे, ये क्या बात लेकर बैठ गए... एकदम बेकार की बात... वैसे बातें तो हम लोग बहुत करते हैं...पर इनकी बाते नहीं करते ...तो फिर ?  फिर क्या? जिन्हें हम जानते तो हैं थोड़ा-थोड़ा लेकिन पहचानते नहीं; उनकी बात क्या करना? उनसे बात क्या करना? छोडिए भी जनाब !! कुछ और बात करते हैं...यूँ तो  
बातें तो हम लोग बहुत करते हैं...
काम की बातें, कुछ सीखने-सिखाने की बाते, स्वयं को बेहतर से बेहतर बनाते रहने की बातें, सही और सच्ची राह पर चलने की बातें, जीवन से संघर्ष करने के लिए मनोबल बटोरने की बातें, औरों के काम आने की बातें, समाज राष्ट्र और विश्व को सुन्दर रहने योग्य बनाने के तरीकों पर बातें, मानव को मानव बनाए रहने की बातें...ये बातें तो करते ही होंगे न...नहीं, नहीं, क्या फिर वही घिसी-पिटी बातें लेकर बैठे हैं ...ये  भी कोई बातें है करने की ...ये तो किताबी बातें हैं ...इस पर कोई और लोग यानि कवि –लेखक जैसे ही लोग बातें करें...हम क्यों इन बातों में अपना दिमाग ख़राब करें ...
अच्छी बात है!! आप ही बता दें कि आप क्या बातें करते हैं ? हाँ, हाँ, क्यों नहीं!! यूँ बात तो बहुत करते हैं, पर, कभी गौर ही नहीं किया कि क्या बात करते है?? बस...इतना जानते हैं कि बातें तो हम लोग बहुत करते हैं......लेकिन क्या बात करते हैं ; ये न पूछिए !! ये सब सोचने-विचारने का समय ही कहाँ हैं कि कुछ सोचें...बस...बातें करते हैं...कुछ निष्कर्ष निकलने के लिए नहीं ...बातें करने के लिए बात करते हैं... अच्चा तो अपने बारे में, अपनी संवेदनाओं के बारे में , अपने दिल अपने मन अपने शौक अपनी पसंद-नापसंद की बात करते होंगे न ...क्या आप भी ...अपने बारे में जानते ही कहाँ हैं ?...और अगर जानते हैं तो कितना जो बात करें !!! ओह !!! तो बिना बात के ही बात करते हैं आप सब लोग !!! कभी गौर ही नहीं किया कि हम क्या बात करते हैं ?
ये तो और भी अच्छी बात है ...बात, जब दिल से निकलती है तो असर करती है, लोगों के  दिलों तक अवश्य पहुँचती है, और जो बात आत्मा से निकलती है वो कभी झूठ नहीं होती, बातों से किसी को भी प्रसन्न कर सकते हैं .... इस तरह से तो तो सभी प्रसन्न और मस्त होने चाहिए ...है न; पर लोगों को देख करे ऐसा लगता तो नहीं ...

इतना सब देख कर एक बात जो मुझे खटकती है वो ये कि मोबाईल, कंप्यूटर संदेशों के ज़माने में बातें तो बहुत हो रही हैं, रात दिन हो रही हैं यहाँ तक कि इतनी हो रही हैं ही बातों के आलावा और कुछ नहीं हो रहा ...फिर भी क्या बात है कि दिलों में दूरिय बढ़ रहीं हैं...रिश्ते ख़त्म हो रहे हैं...लोगों के बीच बात ख़त्म होती जा रही..
ये तुम पर है कि किस बात पर गौर किया जाये, क्या करें कि बात बन जाये...कवि प्रदीप की कही बात याद आ रही है ---
कभी खुद से बात करो, कभी खुद से बोलो ।
अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो ।
हरदम तुम बैठे ना रहो - शौहरत की इमारत में ।
कभी कभी खुद को पेश करो आत्मा की अदालत में ।
ओ नभ में उड़ने वालो, जरा धरती पर आओ ।
अपनी पुरानी सरल-सादगी फिर से अपनाओ ।
कभी कभी खुद से बात करो ।
कभी कभी खुद से बोलो ।


@पूनम चंद्रलेखा


Comments

  1. Read many of your blogs. Beautiful poetry. It reveals many of the unknown facets of your sensitivity, which was hidden from me.

    Keep writing. More than writing, it is exploration into deeper layers of our pains and voids.

    Just a thought.. you don't need to create separate blog name for each new writing. You may consolidate all of these in a single blog name and continue there.

    Best wishes

    Manoj Kulshreshtha

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